प्राचीन भारतीय इतिहासमध्यकालीन भारतीय इतिहास

भारत गुलाम कैसे बना था।

एक समय हमारा भारत देश भी सोने ही चिड़िया कहलाता था, लेकिन( गुलाम) आज भारत देश की जो हालत में है उसके जिम्मेदार पहले तो अंग्रेज थे, जिन्होंने भारत देश पर 200 सालों तक राज कर भारत को लूटा था. और दूसरे लोग वो है जिन्हें चुनकर हम भारत की सत्ता में लाते है.

भारत गुलाम कैसे हुआ था

आज हम भारतीय राजनीति को लेकर किसी भी तरह का आरोप-प्रत्यारोप नहीं करेंगे. आज हम आपको ऐसे शख्स के बारे में बताएंगे जिसकी वजह से हमारा भारत सोने ही चिड़िया से तब्दील हो कर गुलाम बन गया था. जिसकी वजह से भारत पर 200 सालों तक अंग्रेजों का साशन था.

रॉबर्ट क्लाइव यह वही शख्स है जिसने भारत में अंग्रेजो की किस्मत लिखी थी. ईस्ट इंडिया कंपनी का एजेंट बनकर 1744 में क्लाइव पहली बार इंग्लैंड से मुंबई आया था. उस समय जहाज से भारत आने में ही करीब एक साल लग जाता था. इस एक साल की यात्रा के दौरान ही क्लाइव ने पुर्तगाली भाषा अच्छे से सीख ली.

bharat कैसे गुलाम हुआ

गुलाम

उस समय मुग़ल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु हो चुकी थी जिस कारण साम्राज्य कमजोर हो चुका था. फ़्रांस, पुर्तगाल, ब्रिटेन जैसे कई देशों की नज़र भारत पर बनी थी. क्लाइव चालाक और अति क्रूर किस्म का एक व्यक्ति था और भारत में आते ही उसने अपनी चाले चली जिसमे वह कामयाब भी हो गया और वह अपने सीनियर्स की नजरो में आ गया और ब्रिटिश सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर काबिज हो गया.

1756 के समय में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला थे. कलकत्ता पर पूर्ण नवाब का कब्ज़ा था. लेकिन नवाब के सेनापति मीर जाफ़र ने गद्दारी और चालाकी से नवाब को हरवा दिया. क्लाइव और मीर जाफर के बीच एक समझौता हुआ 21 जून 1757 को प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला और क्लाइव की सेनायें एक दूसरे के आमने-सामने थी.

पूरे युद्ध में नवाब की फौज अंग्रेजो पर भारी पड़ रही थी. मीर जाफर जैसा गद्दार के साथ होने से तो हारना निश्चित था. नवाब की हार के दो कारण थे पहला तो ख़राब मौसम और बारिश जिस कारण तोपों का बारूद ख़राब हो गया. दूसरा था मीर जाफर जो सेना के एक बहुत बड़े हिस्से को जंग के मैदान से बहुत दूर ले गया.

इस जीत के साथ ही अंग्रेजो को बंगाल पर पूर्ण कब्ज़ा कर लिया. 1764 में बक्सर की लड़ाई में भी रॉबर्ट क्लाइव ने चालाकी और धोखेबाजी ने जीत दर्ज कर ली. क्लाइव ने कमजोर शासक पर अपनी नजर साधी और उन्हें अपना निशाना बनाया. इलाहाबाद की संधि में क्लाइव ने छल कपट की निति का प्रयोग किया. उस समय बंगाल ब्रिटेन से काफी अमीर था. कहा जाता है कि जब क्लाइव ब्रिटेन आया तो वह पूरे यूरोप का सबसे अमीर इंसान था.

भारत देश को बर्बाद करने में क्लाइव का अहम योगदान था, उसकी चालाक नीतियों से ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के दूसरे हिस्सों में अपनी पकड़ बना ली. लोगों को गुलाम बनाकर रखा गया, टेक्स लगाना प्रारंह कर दिया, कृषि की नीतियाँ ऐसी बनाई की किसान ही पूर्ण बर्बाद हो गए. 1770 में बंगाल में अकाल के कारण प्रभावित इलाके के एक करोड़ लोग भूख से तड़पकर मर गए थे.

कॉमनवेल्थ और गुलाम

15 अगस्त, 1947 को जवाहर लाल नेहरू ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. नेहरू डोमिनियन सरकार के ही प्रधानमंत्री थे. ये एक अंतरिम व्यवस्था थी. इसीलिए नई व्यवस्था लागू होने तक गवर्नर जनरल का पद भी जारी रखा गया. उस समय भारत के गवर्नर जनरल लुईस माउंटबेटन थे. 21 जून, 1948 को सी राजगोपालाचारी भारत के गवर्नर जनरल बने. 26 जनवरी, 1950 को आज़ाद भारत का संविधान लागू होते ही भारत एक सम्प्रभु गणराज्य (Sovereign Republic) बन गया. संप्रभु माने ऐसा देश, जो किसी और के बस में नहीं, अपने कानून पर चलता है. तो भारत में चलती है भारत की चुनी हुई सरकार की. किसी और के बस में नहीं का मतलब एक सदी से ज़्यादा हम पर राज करने वाले इंग्लैंड के बस में भी नहीं. भारत पर बस भारत के लोगों की चुनी हुई सरकार का राज चलता है.

GK Curent Affairs march

सुभाष कश्यप और प्रोफेसर राजीवलोचन, दोनों इस सवाल का एक ही जवाब देते हैं. वो पहले कॉमनवेल्थ समझाते हैं. वो बताते हैं कि कॉमनवेल्थ की स्थापना 1931 में हुई. शुरुआत में वो देश इसका हिस्सा थे जिनपर ब्रिटेन का राज था. इसका नाम भी ब्रिटिश कॉमनवेल्थ था. लेकिन 1949 में इसे कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस यानी ‘राष्ट्रमंडल देश’ बना दिया गया. उसके बाद से भारत पर ब्रिटेन का कोई राज नहीं रहा. कॉमनवेल्थ ग्रुप की 1971 में हुई ‘सिंगापुर घोषणा’ में साफ कहा गया कि “ये सब राष्ट्रमंडल देश, स्वतंत्र सम्प्रभु देशों का एक स्वैच्छिक संगठन है. इसके सब देश अपने-अपने लोगों के हितों के लिए, अपनी अंतरराष्ट्रीय समझ व विश्व शांति के लिए सलाह लेने और फैसले लेने के लिए ख़ुद जिम्मेदार हैं

इंग्लैंड के गुलाम रहे किसी देश के लिए ज़रूरी नहीं कि वो कॉमनवेल्थ का हिस्सा रहे. जैसे दक्षिण अफ्रीका ने 1961 में कॉमनवेल्थ छोड़ दिया था और 1994 में वापस हिस्सा बन गया. पाकिस्तान ने 1972 में कॉमनवेल्थ छोड़ दिया था और 1989 में फिर से जॉइन कर लिया. ऐसे ही मोज़ेम्बिक और रवांडा पर कभी ब्रिटेन का शासन नहीं रहा लेकिन फिर भी वह कॉमनवेल्थ का हिस्सा हैं. कनाडा 1982 और ऑस्ट्रेलिया 1986 तक खुद को इंग्लैंड के अधीन मानते थे. लेकिन 1982 में आए कनाडा एक्ट और 1986 के ऑस्ट्रेलिया एक्ट के बाद ये दोनों स्वतंत्र देश बन गए.

कॉमनवेल्थ में रहने के बहुत सारे फायदे हैं जिनकी वजह से देश इसका हिस्सा बने रहते हैं. जैसे कॉमनवेल्थ देशों में आपसी आर्थिक व्यापार आसान होता है. कॉमनवेल्थ देश एक-दूसरे को सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानते हैं. ऐसे में इन देशों के नागरिकों को दूसरे देश की नागरिकता लेने में परेशानी नहीं होती. कॉमनवेल्थ के देश अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर खूब ज़ोर देते हैं. संयुक्त राष्ट्र में किसी मुद्दे पर विवाद होने पर कॉमनवेल्थ देश एक-दूसरे का समर्थन करते हैं. जब किसी कॉमनवेल्थ देश को ऐसे किसी देश में काम होता है, जहां उसका दूतावास न हो, तो वो उस कॉमनवेल्थ देश की मदद ले सकता है, जिसका संबंधित देश में दूतावास हो. कॉमनवेल्थ देश जब दूसरे कॉमनवेल्थ देशों में अपने मिशन (दूतावास) खोलते हैं, तो उन्हें उच्चायोग (High Commission) कहा जाता है. दूसरे देशों के मिशन दूतावास कहलाते हैं. मिसाल के लिए भारत और ब्रिटेन कॉमनवेल्थ देश हैं. भारत का ब्रिटेन में मिशन ‘हाई कमीशन’ कहलाता है. वहीं, भारत का अमरीका में मिशन ‘एम्बैसी’ कहलाता है. क्योंकि अमरीका कॉमनवेल्थ का हिस्सा नहीं है. गुलाम

2. इंग्लैंड के चमचे

अब आते हैं चमचों वाले सवाल पर. चमचों को सत्ता देने की बात पर जवाहर लाल नेहरू को दिखाया गया है. जवाहर लाल नेहरू साल 1912 में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े. 1947 में भारत के आजाद होने से पहले तक जवाहर लाल नेहरू करीब 9 साल जेल में रहे. तो अंकित का तर्क है कि ब्रिटिश सरकार ने अपने चमचे को 9 साल तक जेल में रखा. इसे समझने में आम दिमाग को परेशानी होती है.

3. भारत में इंग्लैंड के कानून

GK current Affairs Hindi गुलाम

इंग्लैंड के कानून आज भी भारत में चलते हैं. यह बात उतनी ही सही है जितना सूरज का दक्षिण से उगना. भारत एक स्वतंत्र देश है जिसका खुद का संविधान है और खुद के बनाए कानून हैं. इन कानूनों को कभी भी सहूलियत के हिसाब से बदला जा सकता है. भारत के संविधान में एक भी आर्टिकल किसी देश से कॉपी नहीं किया गया है. संविधान सभा की चर्चाओं में इस पर बहस हुई थी कि क्या संविधान दूसरे देशों से कॉपी किया जा रहा है? इस पर बहसों में जवाब दिया गया. संविधान के कुछ आर्टिकल मिलते-जुलते हो सकते हैं. और संविधान में जरूरत के हिसाब से कभी भी चेंज किया जा सकता है. हां, ऐसे कई कानून हैं, जो तब अस्तित्व में आए, जब अंग्रेज़ों का शासन था. इनमें से जो आज़ाद भारत के मूल्यों के हिसाब से सही पाए गए, वो बने रहे. लेकिन इंग्लैंड के कानून के रूप में नहीं, भारत की संसद द्वारा मान्य कानून के रूप में. जो पुराने कानून भारतीय मूल्यों के हिसाब के नहीं थे, वो खत्म हो गए. ये एक निरंतर प्रक्रिया है जो चलती रहती है. जैसे समलैंगिकता को अपराध बताने वाली धारा 377 अंग्रेज़ों ने 1864 में लाई थी. सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में अपने एक फैसले से इसे खत्म कर दिया.

4. रानी का वीज़ा– गुलाम

अब बात रानी के वीज़ा की. वीज़ा की जरूरत तब पड़ती है, जब आपके पास कोई पासपोर्ट हो. इंग्लैंड की महारानी को वीज़ा की जरूरत इसलिए नहीं पड़ती कि उनके पास कोई पासपोर्ट ही नहीं है. इंग्लैंड में रानी का दर्जा सबसे ऊपर है, सरकार से भी ऊपर. इंग्लैंड का पासपोर्ट वहां की रानी के दस्तखत से ही जारी होता है. इसलिए इंग्लैंड में नियम है कि रानी को पासपोर्ट लेने की कोई जरूरत नहीं है. इंग्लैंड की महारानी की वेबसाइट पर भी यह लिखा है. रानी बिना पासपोर्ट विदेश जा सकती हैं क्योंकि इंग्लैंड ने दूसरे देशों से ऐसी संधि कर रखी है.

5. मोदी जी का वीज़ा -गुलाम

अब आते हैं भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के वीज़ा की. किसी भी देश के राष्ट्राध्यक्ष मतलब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को किसी दूसरे देश जाने के लिए वीज़ा की जरूरत नहीं होती. इसमें कुछ भूमिका देशों के बीच हुई संधियों की होती है और कुछ अंतरराष्ट्रीय मंच पर मेहमाननवाज़ी के तकाज़े की. इसका एक उदाहरण- नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो अमरीका ने उन्हें वीजा नहीं दिया था. लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद वो अमरीका बुलावे पर गए, उन्हें वीजा की ज़रूरत ही नहीं रही. ऐसे ही अफगानिस्तान से लौटते हुए मोदी पाकिस्तान चले गए थे जबकि वो कोई पूर्व निर्धारित कार्यक्रम नहीं था. ऐसे में जाहिर है कि उनके पास वीज़ा नहीं होगा क्योंकि पीएम को वीज़ा की जरूरत नहीं होती.

200 सालों मे कितना धन ले गए अंग्रेज

भारत को आजाद हुए 70 साल से ज्यादा हो गए हैं और यह आजादी 200 साल की गुलामी के बाद मिली थी. ब्रिटेन ने इन 200 सालों में भारत को बहुत लूटा और भारत की अरबों की संपत्ति लेकर चले गए. लेकिन कभी आपने यह अंदाजा लगाया है कि इन 200 सालों में भारत की कितनी संपत्ति को लूट लिया गया… आज आपको इस सवाल का जवाब मिल जाएगा

आपने सुना होगा कि भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, लेकिन ब्रिटिश शासन के बाद भारत का काफी धन लूट लिया गया. वैसे तो इसका अंदाजा लगाना ही काफी मुश्किल है, लेकिन प्रसिद्ध अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक ने वो संभावित रकम बताई, जितनी भारत से लूटी गई है गुलाम

RAVI KISHAN LIFESTYLE

Tags
Show More

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close
Close